Fri. Apr 10th, 2020

तर्पण पत्रिका

मुखर प्रतिरोध की त्रैमासिकी…

दबी आवाज़ें

मज़दूरों के हथौड़ी 
ठोंकने की आवाज़,
सब्जीवाले की 
दाम चीख़ती आवाज़,
विश्वविद्यालयों की
गूँजती बेक़रार आवाज़,
सुबह-सुबह अज़ान और 
मुकद्दस भजनों की आवाज़,
बस्तियों में ढील हेरती 
युवतियों की आवाज़,
सड़कों पर कोलतार बिछाते 
रोडरोलर की आवाज़,
पोखरों में नंगे नहाते 
बच्चों की आवाज़,
खेत को मथते 
ट्रैक्टरों की आवाज़,
झुंड में घूमते कुत्तों के 
भौंकने की आवाज़,
ट्रॉली में ईंट ढोते
लेबरों की आवाज़,
साक़ी और बदमस्त 
शराबियों की आवाज़,
स्कूलों की छुट्टी करतीं
घण्टियों की आवाज़,
ट्रेन में नल्ली बेचते
छोटे बच्चे की आवाज़,
चाँद को निहारते
दो उश्शाक़ों की आवाज़,
खेल दिखाते
मदारी की आवाज़,
क़ज़ा पर
राम-नाम-सत्य की आवाज़,
मसाईबों से 
शिकस्त खाने की आवाज़,
लाख और कांच से बनी
चूड़ियों की आवाज़,
आईसक्रीम-गोलगप्पे बेचते
अंकल की आवाज़,
मुख़ालिफ़त करती
आमादा अफ़राद की आवाज़,
हक़-हुक़ूक़ औ’ 
जज़्बात की आवाज़,
दब जाती है
उस निज़ाम की आवाज़ के आगे
जो शबाब पर है
और मसल देना चाहती है
हर उस आवाज़ को 
जो उसका फ़ैज़ नहीं करतीं!
आयुष चतुर्वेदी
  छात्र (कक्षा 11)
   वाराणसी