Tue. May 26th, 2020

तर्पण पत्रिका

मुखर प्रतिरोध की त्रैमासिकी…

कविता

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मज़दूरों के हथौड़ी  ठोंकने की आवाज़, सब्जीवाले की  दाम चीख़ती आवाज़, विश्वविद्यालयों की गूँजती बेक़रार आवाज़, सुबह-सुबह अज़ान और  मुकद्दस...

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आज मैं, वो नही जो पहले था मैं बदल चुका हूं .......... पहले था सीधा साधा, नेकदिल, विश्वासी, संजिदगी भरा...

तुम कहते हो महिला की कोई जाति नहीं होती।  फिर शोषण की कैसे अपनी जाति हो सकती है। तुम कहते...

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चंपक वन की शान निराली देखो आई है दीवाली भालू  ने की है खूब सफाई खरगोश भी लाए आज मिठाईबंदर ...

क्या होगा भयानक दृश्य वहां वीरों ने गवाये प्राण जहां कतरा कतरा था खून गिरा थम गया समय ही पल...

कुपोषण है शत्रु बड़ा बलवान इसे मिलकर भगाना है चलिए अब हम सबको जागरूकता का अलख जगाना है जागरूकता ऐसी...