Fri. Apr 10th, 2020

तर्पण पत्रिका

मुखर प्रतिरोध की त्रैमासिकी…

 लोग मरते नहीं थे दुआ के लिए

सिर्फ़ जीते रहे वो अना के लिए

बेहया को ये कोई बताए ज़रा
हुस्न पैदा है होता हया के लिए

दिल मेरा आपने है दुःखाया बहुत
हाल पर छोड़िए अब ख़ुदा के लिए

देख लूँ इक झलक मौत आ जाएगी
ज़िन्दगी है बची इल्तज़ा के लिए

दंड उसका सुदामा को मिलता नहीं
कुछ बचाता अगर वो सखा के लिए

बलजीत सिंह बेनाम
सम्प्रति:संगीत अध्यापक