Fri. Apr 10th, 2020

तर्पण पत्रिका

मुखर प्रतिरोध की त्रैमासिकी…

इस देश में
लोग यूँ हीं मरते हैं

लेकिन ‘यूँ हीं’
मरने के लिए
इनका देशी होना जरूरी है।

याद रखना
अगर शब्द ‘विदेशी’ जुड़ा हो
तो आसान नहीं है
इनका मरना।

सरकारी अस्पतालों में
मरे लोग और
पांच सितारा अस्पतालों में
दिवंगत आत्माओं के बीच
कुछ तो फर्क होता है।

तुम इतरा सकते हो
ऐसी जगह होने पर
जहाँ किसी प्रजाति के
आगे या पीछे लगे शब्द
बदल सकते हैं उसका मोल।

अफ़सोस है
वो शब्द जिस दुनिया से
आए हैं,
वहाँ शब्दों की नहीं
सिर्फ प्रजाति की कीमत होती है।

 श्वेतांक कुमार सिंह
चकिया, बलिया/
कोलकाता