Wed. Apr 8th, 2020

तर्पण पत्रिका

मुखर प्रतिरोध की त्रैमासिकी…

मेरे प्यारे अटल

मेरे प्यारे अटल!
तुम कहाँ गुम हुए?
 कहाँ गुम हुए ?
मेरे प्यारे अटल!
तुम में था एक कवि,
और एक नेता सरल।
तुम कहाँ गुम हुए ?
मेरे प्यारे अटल!
हैं तुम्हें खोजते 
मेरे दोनों नयन,
हो कहाँ तुम,
कहाँ कर रहे हो शयन?
आओ वापिस 
तुम्हें देखना चाहता हूँ।
कुछ पुष्प मैं तुमपर 
फेंकना चाहता हूँ।
मानता हूँ कि 
आना है मुश्किल बड़ा।
राह में है 
हिमालय भी आड़े खड़ा।
पर दिखाओ
तुम अपना वही हौसला।
फोड़ दो 
पर्वतों का घमंडी घड़ा।
कर रहा हूँ प्रतीक्षा
हर क्षण, पल -पल।
आ जाओ लौट कर मेरे प्यारे अटल।
आ जाओ लौट कर मेरे प्यारे अटल।।

आयुष चतुर्वेदी (सीएचएस, छात्र, कक्षा-11)
    सीएचएस,बीएचयू वाराणसी