Fri. Apr 10th, 2020

तर्पण पत्रिका

मुखर प्रतिरोध की त्रैमासिकी…

बारिश के दिनों में

बारिश के दिनों में
बारिश के दिन याद नहीं करता
बारिश की रातें याद करता हूँ मैं

उन्हीं रातों के भींगते अंधेरे में उगतीं थीं
मां की आंखें
अंधेरा चीरने की कोशिश में
कभी गुम हो जाती थीं
घर के अंदर उसी अंधेरे में
कभी बरसती नहीं थीं,
बस पसीजती थीं कभी-कभी
घर की कच्ची दीवार की तरह

घर दुबका रहता था
अंधेरे की भींगी -भारी चादर में
हम भाई – बहनें दुबके रहते थे
एक रस्सी खाट पर मां की सूती साड़ी में
और पिता उसपर डाल देते थे
अपनी एक पुरानी खद्दर धोती
कि हम बच्चों की देह में बची – बनी रहे गरमी
लेकिन हम बच्चे तब यह कहाँ समझते थे
कि धोती – साड़ी का सम्मिलित संघर्ष जरूरी है
दुनिया में गरमी बचाने के लिए

भींगते अंधेरे में
माँ जब बुझी हुई ढिबरी दुबारा बालती थी
हम बच्चे नहीं जानते थे कि
यह ढिबरी दरअसल वह
अपनी ही आंखों से निकालती थी
और पिता उसकी थरथराती रोशनी में
शिनाख्त करते थे – छप्पर कहाँ – कहाँ चूता था
और माँ को बताते थे कि
चूते हुए छप्पर के नीचे घर में
कौन-सा कोना सुरक्षित है ढिबरी के लिए
ताकि रोशनी में कम होती रहे रात की लंबाई

पिता ही बताते थे माँ को
कि कहाँ -कहाँ करने थे तैनात
घर के सारे खाली बरतन
घर की जमीन गीली होने से बचाने के लिए
घर के ठीक बीचोंबीच खड़ा
वह बूढ़ा खंभा क्यों चिढ़ता था
बरतन – बूँद की टन् – टन् जुगलबंदी पर
और वह क्यों सहमा रहता था
दीवार पर अपनी ही मोटी छाया हिलती देख
हम बच्चे यह कहां समझते थे तब ?

सिरहाने में बैठी मां,पैताने में बैठे पिता
उनके चेहरे से चूती हुई चिंता फिलहाल
ढिबरी में खत्म होते मिट्टी तेल को लेकर थी या
उस डूबते धान को लेकर जिसके सीस पर
टिके होते थे कल के सुख और सपने
हमें तब यह सब समझ में कहां आता था !

और जैसे – जैसे असुरक्षित होते जाते थे
घर में बाकी कोने एक – एक कर
ढिबरी और हम बच्चे सहित खाट की जगह
रात – भर बदलते ही रहते थे मां – पिता
ताकि ढिबरी बलती रहे
और वे हमें भींगते अंधेरे से बचा सकें
बचा सकें वे अपनी जिंदगी की कुल कमाई
आगे बारिश के दिनों में खरचने के लिए

अभी यहाँ
उन रातों को याद किए बिना मुश्किल है अभी की बारिश को कोई अर्थ देना
और बारिश को समझे बिना मुश्किल है
जिंदगी की जड़ें ढूँढना

इसलिए
बारिश की रातें याद करता हूँ मैं
बारिश के दिन याद नहीं करता
बारिश के दिनों में

दिलीप दर्श
मूल निवास : बलिया, प्रखंड – रूपौली, जिला – पूर्णिया, बिहार.