Fri. Apr 10th, 2020

तर्पण पत्रिका

मुखर प्रतिरोध की त्रैमासिकी…

दोहे

  
  जीवन भर नर्तन किया, फिर ली आंखें मूँद ।
   गर्म तवे पर नाचती, ज्यों छन-छन-छन बूँद ।।
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‘अंकुर’! मन के कुम्भ में, डाल प्रेम का इत्र ।
 पीकर  महके मित्र बन, सारे शत्रु विचित्र ।।
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रंच नहीं कटुता कहीं ,ऐसा हो संसार  ।
 तब भव – सागर पार हो, तेरा-मेरा प्यार  ।।
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आप सभी से पूछिए, मिलकर उनका क्षेम ।
जन गण मन में ‘आपके’, प्रति बस जाए प्रेम  ।
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काम-क्रोध-मद-लोभ ही, है जिसका आधार।
कभी नहीं मिलता उसे, रघुनन्दन का  प्यार।।
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पछताएं मत आप अब, करें हाथ से सैर ।
 वक़्त भागता जा रहा , सर पर रखकर पैर।।
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चुहिया भी निकली नहीं, खोदे खूब पहाड़।
ताड़ प्रश्न; हल तिल नहीं, तिल बन बैठा  ताड़।
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तन पर तम छा जाय पर, बुझे न मन का दीप।
मन है मोती प्रेम का, तन है उसका सीप।।

नाम-  अंकुर सहाय “अंकुर’ 

स्नातक (जीवविज्ञान), परास्नातक(अंग्रेजी, शिक्षाशास्त्र)
        बी.एड., टीइटी, शोध छात्र (पूर्वांचल विश्व.)