Fri. Apr 10th, 2020

तर्पण पत्रिका

मुखर प्रतिरोध की त्रैमासिकी…

दाता बनकर तो देखो!

मैं जानता हूँ
उनके सामने
तुम याचक बनकर ही तो
रहते आये हो अब तक
तभी तो हर बार की तरह
इस बार भी
भूख/भय
गरीबी/लाचारी
बेरोजगारी
बेहाल शिक्षा/स्वास्थ्य/आवास
के विरुद्ध संघर्ष
और
भ्रष्टाचार मिटाने
हताशा दूर करने
और
विकास के नाम पर
न्याय दिलाने
वे आते हैं तुम्हारे पास
कभी पूरे न होने वाले
आश्वासन/
वायदें/
घोषणाएँ लेकर
जानते हैं कि
तुम याचक हो
और
तुम्हें भूलने की आदत है
और वे दाता
तुमने ही तो बनाया है उन्हें
कभी तुम भी
अपनी
बेचारगी को छोड़कर
अपनी
क्षमता को पहचानकर
भूमिका बदलकर तो देखो
वे याचक बनकर आते हैं
और
याचक ही बने रहें
एक बार
तुम स्वयं
दाता बनकर देखो।

डॉ प्रदीप उपाध्याय,

उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,देवास,म.प्र.