Fri. Apr 10th, 2020

तर्पण पत्रिका

मुखर प्रतिरोध की त्रैमासिकी…

जल समाधि-: एक अवलोकन

      भारत और नेपाल दोनों देश एक दूसरे के पड़ोसी होने के साथ-साथ उनमें काफी समानताएं भी पाई जाती हैं। यही कारण है कि नेपाल की धरती पर साहित्यकार डॉ लोकनाथ वर्मा राहुल कृत उपन्यास जल समाधि  को पढ़ने पर ऐसा लगता है कि वह विदेशी धरती पर नहीं वरन् भारत के किसी गांव की धरा पर लिखा गया है। जिसके नायक है शंकर,जिसे लोग प्यार से काका कहते हैं। और जल कपट रहित सरल स्वभाव के छोटे बड़े का उचित सम्मान देने वाले शंकर काका कहलाने के उम्र के हैं भी।पर गांव के अधिकांश लोगों की तरह हैं वो अंगूठाछाप।
  गांव में कुछ लोग खबरी होते हैं वे बात को फ़ैलाने में माहिर होते हैं सुखवा  ये बात (काका को भगवान श्रीराम चंद्र जी मिले थे और अपनी बगल में बैठाकर काफी देर तक बात किया था) पल भर में पूरे गांव में फैला देता है। गांव वाले विश्वासी होते हैं इसका पता हमें इस बात से चलता है कि भगवान श्रीराम चंद्र से काका की मुलाकात वाली बात लोगों के कान में पड़ते ही काका के दरवाजे पर झाड़ फूंक कराने वालों की भीड़ लग जाती है। इसके साथ साथ गांव वाले अनपढ़ होने के बावजूद भी हाजिर जवाबी उस्ताद होते हैं। बजरंगी महाराज और सुखवा के वार्तालाप की एक बानगी- ” तुम अपने आंखिस देखें रह्यो ।”
” का देखब जरुरी है ।”
” जब तक न देखौ अपने नैना तब तक न मानो किसी के कहना।”
” महाराज एक बात बताना जाय का आप अपने बाबा के बाप का देखगा है।”
” नहीं।”
”मतलब उनका आप नाहीं मनते।”
   गांव किस तरह उच्च वर्ग के लोगों को निम्न वर्ग के लोगों को यकायक मिलने वाला सम्मान हजम नहीं होता।एक उदाहरण-” बजरंगी महाराज के छातिप सांप लोटत रहे,जब ऊ काका के प्रशंसा सुनत रहें।चिंतुवा ठीक होगा। चमत्कार होयगा।”इसी तरह सुकइया कहता है-“गये रहें भ इया , बजरंगी महाराज कहिन काका तीर जाव।दुलारे से भगाया दिहिन।”
शिक्षा में आते बदलाव के बारे में मास्टर मुरली कहते हैं-” शिक्षक और शिष्य केर अंतर्संबंध बहुत मधुर रहे लेकिन अब लरिकन से डेराय क परत है।”
   गांव में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ होती है कल्लन मियां के चरित्र से।जो धन और जन बल में संपन्न होने के साथ-साथ राजनीतिक पहुंच वाले भी हैं जिसके कारण कोई उनके खिलाफ आवाज नहीं उठा सकता।ये जानते हुए भी कि कल्लन मियां नाममात्र का काम दिखाकर सरकारी रकम डकार गए।मगर कौन अपनी हड्डी पसली तुडवाये।यही स्थिति आज भारत के अधिकांश गांवों की है।
  दुनिया चांद और अन्य ग्रहों पर पहुंच रही है भारत के गांव में आज भी छूआछूत और भेदभाव व्याप्त है । जिससे अछूता रामपुर भी है-” महाराज लोग सोचें लागे इसके टठियक (थाली) गुड़ अऊर गगरक(गागर) पानी कइसे लीन जाय।जात केइ ई अछूत।” लेकिन इस बीमारी का इलाज मुरली के सहयोग से होता है। गांव में पिछड़े पन का कारण है संगठन का अभाव और दादागिरी।जिसका उपाय है-“बुराई से लड़ने खातिर जमात चाही , संगठन चाही।काका के अगुवाई में मुरली जैसे बुद्धिजीवियों के सहयोग से ऐसी संगठन बनता है कि रामपुर पुरे क्षेत्र में और देश की पत्र पत्रिकाओं में चर्चा का विषय बन जाता है और आपसी सहयोग से रामपुर गांव में बिना सरकारी मदद के ही सड़क ,अस्पताल, स्कूल बना जाता है खाद्यान्न उत्पादन औद्योगिक क्षेत्र में क्षेत्र में अग्रणी।
   लेकिन इस उपन्यास के नायक काका देश के ठेकेदारों (राजनेताओं)के चंगुल में फंस जाते हैं। प्रजातंत्र में परिवर्तन वाले काका के विचार से एक तरह की शांति पूर्ण क्रांति चिंगारी जल उठती है और राजनेताओं को अपना राजनीतिक कैरियर खतरे में नजर आता है। जिससे बौखलाए धर्म वीरसिंह नामक नेता ने रामपुर सामुहिक आटा चावल उद्योग का बना पैकेट डीलर को मिला कर खाद्यान्न विक्री पर रोक लगा देता है, जिसके कारण एक परिवार को भूख से परेशान होकर आत्महत्या करनी पड़ती है। इस घटना से क्षेत्र के अन्य नेताओं को भी राजनीति चमकाने का मौका मिलता है और वे भीड़ को लेकर शहर के गोदाम पर कब्जा कर लेते हैं। मास्टर मुरली और उनके सहायक को पुलिस भीड़ से बचाकर अस्पताल पहुंचाती है। नेताओं के उकसाने से बौखलाई भीड़ अनियंत्रित होकर शहर में तोड़फोड़ और शुरू कर देती है जिससे पुलिस प्रशासन को कर्फ्यू की घोषणा करनी पड़ती है।
   नेता लोग अपने समर्थकों के साथ रामपुर पहुंच कर भाषण बाजी शुरू कर देते हैं तभी लोगों को पता चलता है कि भाषणबाजी करने वाले नेता धर्म वीर सिंह के कारण यह घटना घटी और शहर में पुलिस इन्हें तलाश रही है।जो काका की हर बात सर आंखों पर रखने लगी थी ।काका की बात अनसुनी कर उग्र भीड़ नेता धर्म वीर सिंह और उनके समर्थकों को आग के हवाले कर देती है।
  हमारे देश में किस प्रकार अपराधी साक्ष्य के अभाव में और अपने चहेतों के सहयोग से सजा से बच जाते हैं इस का उदाहरण काका के शब्दों में-” इतने लोग का न्यायधीश फांसी न दै पाई।साक्ष्य के अभाव में हमका जज दोषी न ठहराय पाई,हम बरी होई जाइब।”
काका अपने समर्थकों से मुरली का अंतिम संस्कार करके लौटते वक्त कहते हैं-“अगर हम राजनीतिक परिवर्तन वाली बात न किये होइत तो ई घटना न घटत।दंगा भवा, कर्फ्यू लगा , मास्टर भाग्या के दुनिया छोडय के परा।नेतन‌का जिंदा जलाय दीनग।जब भगवान श्रीराम का अपने कर्मन केर ा प्रायश्चित जल समाधि लेइ के करय का परा।तो हमहुं अपने कर्मन केर प्रायश्चित क्रिस।”इतना कहकर काका पीछे गड्डे में कूद पड़े और देखते समाधिस्थ।सुखवा सोचता है कि ये जल समाधि भगवान श्रीराम चंद्र की है या काका की।
नेपाल की धरा पर लिखा गया ये उपन्यास भारतीय ग्राम जीवन का एक काका खींचते हुए उसमें सुधार और और भारतीय नेताओं के स्वार्थपूरण घृणित चाल को उजागर करता है।।
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उपन्यास–  जल समाधि ।                      
लेखक–    लोकनाथ वर्मा राहुल
प्रकाशक– ग्रामदीप साप्ताहिक हिंदी अवधी नेपाल
समीक्षक-उदय – राज वर्मा उदय
प्रकाशन वर्ष-2010
मूल्य- 500/