Fri. Apr 10th, 2020

तर्पण पत्रिका

मुखर प्रतिरोध की त्रैमासिकी…

गंधर्व विवाह

ऑनर किलिंग की शिकार पत्रकार निरूपमा पाठक को याद करते हुए

मुझे नहीं मालुम
तुम्हारी हत्या हुई
या
तुमने की
आत्महत्या
हां,
कह सकती हूं इतना
दोनों ही परिस्थितियों में
सिद्ध नहीं हुए, किसी
के प्रयोजन
हो सकता है
सोचा हो तुमने
गर, प्रेम से मेरे
झुक रहा शर्म से
मां-बाप का सिर
वे नहीं चाहते
अपनाना ‘प्रिय’ को
और तुम स्वयं
हो न सकी इतनी आधुनिक
जो रोज- रोज बदलो प्रेमी
तुमने तो माना,
प्रेम का प्रस्फुटन
होता है एक बार
मिलती है जन्नत
एक बार
समर्पित होता तन-मन
एक बार
और सोचा
पहुंचाकर प्रेम को
शादी के द्वार
कर लूं तन-मन का उद्धार
पर,मना न सकी
मानी पिता को;
जो नहीं जानते, क्या है मान
न तोड़ ही सकी
उनके अहंकार
या मनोविकार को

मिथ्याकांक्षा, कट्टरता
और कठोरता को
न सह सकी वे
धमकियां
जो मिली कई रूपों में
बरंबार
जब निकले पिता- भाई घर से
तब कांप उठा जिस्म तो
क्या आत्मा भी
कहीं कर न डालें वे मनमानी
और पहुंचा दें
‘प्रिय’ को
मौत के घर
तब बचाने को
प्रियतम को
दिखा वही इक रास्ता
जो बनता रहा है सदियों से
प्रेमियों का अंतिम हथियार
मिटा दूं स्वयं को
पर आई फिर रूकावट
उदर में पलता
प्रेम का अंश
मांग रहा था –
संसार में आने का अधिकार
दुविधा में पड़ी फिर तुम
द्वंद हुआ मन में
पिता -पुत्र में चुने किसे
कशमकश के बीच भी
तुमने चुना ‘ प्रिय ‘ को
और झूल गई फांसी पर
कौन जाने
तुम्हारे सामंतवादी पिता
अपने मान
में हो गए अंधे
होनहार पुत्री की अपेक्षा
भा रहा हो दंभ
और
रचा फिर
स्नेहपगे
भाई और जनक ने
तुम्हारे
लिए ष्डयंत्र
नहीं जानती तुम
रहा सब
उसी का हिस्सा
बाहर होने के
छदम आवरण
के भीतर
घुसे वे घर में
उन्हीं कलाइयों वाले हाथों ने
जिनपर बांधा करती थी
तुम राखी
और उसी पिता ने
करती रही जिसपर
गर्व और भरोसा अब तक
और उस मां ने
जिस पर तुमने
भी लुटाया स्नेह
और बनाया राजदार
बलि लेली तुम्हारी
पर निरूपमा
बताओ न
क्या सिद्ध हुए
उनके प्रयोजन?
क्या
अब लेंगी जनम नहीं
दूसरी निरूपमा?
वे तो रहे तुमसे भी
नादान
अब तो जान गई हैं
सारी
निरूपमा
पिता के मान ,
उनके दाव और चाल को
अब नहीं करेगी कोई
उनसे मनुहार
मांगेगी नहीं
विवाह के लिए
आशीर्वद
सब करेगी गंधर्व विवाह

…शेली खत्री