Fri. Apr 10th, 2020

तर्पण पत्रिका

मुखर प्रतिरोध की त्रैमासिकी…

सपनो का टूट जाना
टूट कर बिखर जाना
जैसे गहरी खाई में गिरते जाना
अचानक ही धुंधलका छा जाना

नयन अश्रु भी कुछ पल के
फिर भी पा लेने की चाहत
गहन अंधकार में भी
जुगनुओं की जगमग

आशाओं के दीप
हवाओं के झोंकों से
जलते-बूझते,टिमटिमाते
कुछ पल का अंधकार

दूर गगन में
बादलों की ओट से
बाहर आने को आतुर
चाँद-तारे

नहीं छूपते आशादीप
बार-बार बादलों के छा जाने पर
या फिर
धरती पर छाई धुंध के पहरे पर

डॉ प्रदीप उपाध्याय,

उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,देवास,म.प्र.